DIGITELNEWS पर पढ़ें हिंदी समाचार देश और दुनिया से,जाने व्यापार,बॉलीवुड समाचार ,खेल,टेक खबरेंऔर राजनीति के हर अपडेट

 

जिन्ना की तारीफ कर 'घर' में ही घिर गए थे आडवाणी, छोड़ना पड़ा था BJP अध्यक्ष का पद

उत्तर प्रदेश में चुनावी सरगर्मियां तेज हो गई हैं। नेताओं की रैलियां जोर पकड़ रही हैं...जनता उम्मीद लगाए बैठी है कि बात रोजगार, महंगाई, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसे मुद्दों पर होगी, मगर हर बार की तरह इस बार भी मुद्दे गौण हैं और लफ्फाजी जोर पकड़ रही है। हर राजनीतिक दल के लिए लफ्फाजी सबसे सुविधाजनक 'मुद्दा' होती है, इसीलिए तो पाकिस्तान के कायद-ए-आजम मोहम्मद अली जिन्ना () हर चुनाव में मुद्दा बन जाते हैं। इस चुनाव में भी उन्हीं के इर्द-गिर्द भाषण बुने जा रहे हैं, कोई जिन्ना का जिक्र करके किसी को साधने की कोशिश कर रहा है तो कोई इन्हीं जिन्ना पर हमला करके किसी और को साध रहा है। जिन्ना का 'जिन्न' किसके लिए फायदेमंद साबित होगा, ये तो चुनावी नतीजे बताएंगे मगर जब जिन्ना का जिक्र हो चला है तो जिक्र उस 'हादसे' का भी करना चाहिए, जो साल 2005 में तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी के साथ हुआ था। भारतीय जनता पार्टी की छवि 'जिन्ना विरोधी' पार्टी की रही है। हाल ही में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने जिन्ना की 'तुलना' महात्मा गांधी और सरदार वल्लभ भाई पटेल से कर दी। अखिलेश ने कहा था, 'सरदार पटेल, महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू और जिन्ना एक ही जगह पढ़कर आए थे और बैरिस्टर बने। उन्होंने आजादी दिलाई और संघर्ष से पीछे नहीं हटे।' अखिलेश के इस बयान पर खूब बवाल हो रहा है। सीएम योगी तो मंच से इशारों-इशारों में अखिलेश यादव को 'जिन्ना का अनुयायी' कह चुके हैं। मजार पर पहुंचकर आडवाणी ने जिन्ना की तारीफ, संघ-बीजेपी में आया भूचाल मगर 2005 में इसी 'जिन्ना विरोधी' बीजेपी के दूसरे नंबर के नेता और राष्ट्रीय अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी के मुंह से जिन्ना की तारीफ निकल गई। हुआ यूं कि साल 2005 में आडवाणी अपनी पाकिस्तान यात्रा के दौरान पाकिस्तान के जनक मोहम्मद अली जिन्ना की मजार पर गए। वहां वह इतने भावुक हुए कि उन्होंने धर्म के आधार पर भारत का बंटवारा करने के जिम्मेदार मोहम्मद अली जिन्ना को 'सेक्युलर' तक कह दिया। उनके इस भाषण की खबर जैसे ही बीजेपी और संघ मुख्यालय पहुंची, संगठन में भूचाल सा आ गया। भारत वापसी पर भी उनका एयरपोर्ट से लेकर पार्टी कार्यालय तक खूब विरोध हुआ। लोगों के मूड को भांपकर पार्टी नेतृत्व और संघ ने आडवाणी के बयान से दूरी बना ली। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी के लिए यह किसी झटके से कम नहीं था। आडवाणी को छोड़ना पड़ा बीजेपी अध्यक्ष का पद, संघ से रिश्ते हुए कड़वे संघ में आडवाणी के खिलाफ सुर मुखर होने लगे। जिस संघ के लिए वह कभी 'ब्लू आइड बॉय' थे, उसी संघ ने उन्हें पद से हटाने का फैसला कर लिया था। पार्टी के संसदीय दल की मीटिंग बुलाई गई और उनसे इस्तीफा मांग लिया गया। सबको अपने खिलाफ देखकर आडवाणी भी इस्तीफा देने के लिए तैयार हो गए। हालांकि काफी मान-मनौव्वल के बाद संघ उन्हें ने कुछ महीने की मोहलत दे दी। दिसंबर 2005 में आडवाणी की अध्यक्ष पद से आखिरकार विदाई हो गई। हालांकि वह इस तरह से हुई अपनी विदाई से जरा भी खुश नहीं थे...अपनी विदाई के समय राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक को संबोधित करते हुए आडवाणी ने यह तक कह दिया कि अब समय आ गया है कि बीजेपी को अपने रिश्ते संघ से कैसे रखने चाहिए, इस पर पुनर्विचार करना चाहिए...यह आडवाणी की संघ को खुली चुनौती थी। आडवाणी का जाना राजनाथ सिंह के लिए बना अवसर, मिला बीजेपी अध्यक्ष का पद उधर आडवाणी की विदाई से पहले ही पार्टी में नए सिरे से अध्यक्ष पद के लिए उम्मीदवार की तलाश शुरू हो गई। तब राजनाथ सिंह पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव थे। संघ मुख्यालय से उनकी करीबी आज तो किसी से छुपी नहीं है...उस समय भी सब मान बैठे थे कि संघ की तलाश आखिरकार राजनाथ सिंह पर ही पूरी होगी और वही हुआ...आडवाणी के जाने के साथ ही राजनाथ सिंह की ताजपोशी हो गई। राजनाथ सिंह भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए। चूंकि उन्हें आडवाणी के कार्यकाल में रिप्लेस किया गया था इसलिए 2006 तक ही उनका कार्यकाल रहा, मगर 2006 में उन्हें फिर से इस पद पर अगले तीन साल के पूर्ण कार्यकाल के लिए चुना गया। वह इस पद पर 2009 तक रहे। जिन्ना के नाम से जुड़े विवाद की मुख्य वजह क्या?पाकिस्तान के कायद-ए-आजम मुहम्मद अली जिन्ना का नाम जहां पाकिस्तान में पूरे सम्मान से लिया जाता है, वहीं भारत में जिन्ना का नाम लेना भर ही किसी गुनाह से कम नहीं है। उसकी वाजिब वजह भी है। जिन्ना ही पाकिस्तान के जनक हैं, यह उन्हीं की जिद थी कि भारत का बंटवारा और मुस्लिमों का एक अलग देश पाकिस्तान हो...वह अपनी इस जिद को मनवाने में कामयाब भी रहे और नतीजा हुआ कि आज भारत और पाकिस्तान दो अलग-अलग देश हैं। बंटवारे के समय की विभीषिका दोनों ही देशों ने झेली, करोड़ों लोग इधर से उधर और उधर से इधर विस्थापित हुए...लाखों लोग दंगों, भगदड़ और भूख से मारे गए। भारत में जिन्ना को इस रक्तपात का जिम्मेदार माना जाता है, मगर पाकिस्तान के लिए वह आज भी पूज्यनीय हैं। जिन्ना का नाम लेने से क्या होता है फायदा?चुनावों के समय हर पार्टी अपने वोट बैंक को देखती है। वह देखती है कि उसका कोर वोटर कौन है और फिर उसी के मनमाफिक बातें करती है और भाषण दिए जाते हैं। लोकसभा हो या विधानसभा चुनाव...इतिहास उठाकर देख लीजिए जिन्ना लगभग हर चुनाव में मुद्दा बनते हैं। वजह सिर्फ एक होती है...ध्रुवीकरण! कई बार जिन्ना का नाम लेने से नेताओं को फायदा भी होता है तो कई बार नुकसान भी उठाना पड़ जाता है। लालकृष्ण आडवाणी उन्हीं चुनिंदा नेताओं में से हैं जिन्हें जिन्ना की तारीफ करने पर पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद तक को छोड़ना पड़ गया।
Source navbharattimes

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ